Karmo ka fal kese milta he कर्मो का फल

                            कर्मो का फल                                                                                                                             
                                                                  यह समचा संसार एक गहन अभयारण्य में उग आई अनाप - शनाप झाड़ियों के सदृश है तथा जीव अथवा मनुष्य इसमें विचरण या निवास करने के लिए विवश एक प्रशिक्षित माली की तरह । उस बीहड़ एवं सघन अभयारण्य की जटिलताओं एवं विषमताओं से खीझकर वह तथाकथित माली अपने दुर्लभ जीवन को रुग्ण बनाकर , मृत्यु का पर्याय बनाकर , स्वयं के जीवन को औरों की दृष्टि में घृणास्पद बनाकर इस जन्म को कलंकित भी कर सकता है एवं भाग्यफल से मिले इस प्रारब्धरूपी अभयारण्य के कर्मक्षेत्र को अपने कर्म - कौशल से सजा संवारकर एक दुर्लभतम पुष्प और जड़ीबूटी के विशिष्ट उद्यान में भी परिणत कर उसको सभी की जिज्ञासा , अनुसंधान , ज्ञान , रोग हरण औषधियों के अनुपम केंद्र के रूप में भी विकसित कर सकता है । साधना एवं संघर्ष काल के व्यतीत होने पर वही उद्यान कालांतर में विशिष्ट तपोभूमि बन जगत के कल्याण एवं ऋषि - मुनियों की साधना भूमि बन जीव के मोक्ष की आधारभूमि भी सिद्ध हो सकती है । हमें जो इस जन्म में उपहारस्वरूप मिला है , वह अतीत के कर्मों का फल है । आज के कर्म की कृषिभूमि रूपी जीवन में बोया गया कर्म का सुविकसित अथवा रुग्ण बीज भविष्य का प्रारब्धरूपी विटप बन महकेगा । सुख अथवा दुख हमारे कर्मों के संचित मूलधन रूपी वृक्ष पर फल रूप में ही लगते हैं । बोए गए बीज पर इस जन्म में अथवा जब भी , फल लगेगा तो तो उसी बीज का लगेगा । हर जन्म में जीव अत्यधिक चतुर बन विधाता की कर्म सारणी के बंधनों में चालाकीवश हेरफेर कर खुद को कर्मों की दौड़ में आगे निकाल देना चाहता है , लेकिन नहीं जानता कि उसका रिमोट उस ईश्वर रूपी मालिक के हाथ में है , जिसके पास उसकी हर चालाकी का लेखाजोखा बिना भेजे स्वतः ही उसके पास आ जाता है । कर्म भी वह अकेले ही करता है एवं कर्म के फल भी उसे अकेले भोगना है । तो फिर क्यों नहीं वह केवल सत्कर्म करता ? सत्कर्म के मनोहारी विटप पर सभी के लिए मृदु , स्वादिष्ट एवं कल्याणकारी फल ही लगता है ।

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