Samajik Sambandho ka jaal सम्बन्धो का जाल

                          संबंधो का जाल                                                                                                                                                               
                                                                          परमात्मा हर जीव को जन्म देता है । उसके पोषण की व्यवस्था करता है और नियत अवधि के बाद उसका जीवन हर लेता है । सृष्टि का चक्र इन तीन बिंदुओं पर ही टिका हुआ है । इस दृष्टि से एक ही शाश्वत संबंध है जो परमात्मा और जीव के मध्य स्थापित होता है । परमात्मा न चाहे तो जीव का जन्म ही न हो । इस इच्छा के लिए परमात्मा से दिन - रात प्रार्थना करने वालों की कमी नहीं है । विडंबना यह है कि जीव जन्म लेते ही उस शाश्वत संबंध को भुला देता है और अपने बनाए संबंधों के जाल में उलझकर रह जाता है । उसे माता - पिता , भाई - बहन , पत्नी , बेटी बेटा , मित्र आदि ही दिखाई देने लगते हैं । इन संबंधों की औपचारिकता निभाने में इतना समय निकल जाता है कि परमात्मा से संबंध निभाना तो दूर याद करने का समय नहीं बचता । यदि हम अपने मूल संबंध के प्रति निष्ठावान नहीं हैं तो हम किसी अन्य संबंध को भी निष्ठा से निभाने | योग्य नहीं हैं । परमात्मा से संबंध की चिंता न करने का ही फल है कि आज निकट से निकट संबंध में खोट दिखाई दे रहा है । सारे संबंध स्वार्थों पर टिके हैं । जब वे स्वार्थ पूरे नहीं होते तो संबंध पल भर में ध्वस्त हो जाते हैं । बाहर से सामान्य दिखने वाले सारे संबंध मन की गहराइयों में कहीं न कहीं दरके हुए हैं । जब ये दरके संबंध दबाव नहीं सह पाते तो सामाजिक विघटन दिखने लगता है । जब जड़ें सूखने लगें तो | पेड़ कितने दिनों तक हरा - भरा रह सकता है । हम एक भयावह स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं । इसका एक ही | समाधान है अपने मूल संबंध की जड़ों को फिर से हरा - भरा करना । परमात्मा ने जीवन दिया । जीवित रहने के लिए | सांसें दे रहा है । इससे बड़ा कारण और क्या हो सकता उसके प्रति आभारी होने का । हर एक सांस के लिए उसका आभारी होना ही परमात्मा से संबंध की निष्ठा का निर्वहन करना है । इससे संसार और जीवन को | देखने की दृष्टि बदल जाएगी ।

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