Jivan or chinta जीवन और चिंता
जीवन और चिंता
life and worry . जीवन और चिंता मानव जीवन का गंभीरता से अध्ययन करें तो यह सत्य सहजता से मुखर होता है कि इस दुनिया में मानव का चिंताओं से रिश्ता धरती पर सभ्यता के विकास सरीखा ही प्राचीन और सनातन है । चिंताएं खुले आकाश की तरह अनंत और गहरे सागर की तरह अगाध होती हैं । इनकी अपनी प्रकृति और प्रभाव होते हैं । कुछ चिंताओं से जीवन की दिशा अवरुद्ध हो जाती है तो कुछ चिंताएं आश्चर्यजनक रूप से उत्प्रेरक का कार्य करती हैं । चिंताएं जीवन के साथ चलती हैं और ये जीवन के साथ ही खत्म होती हैं । यही कारण है कि चिंतारहित जीवन की संभावना महज कल्पना है , किंतु चिंताओं पर चिंतन यहीं खत्म नहीं हो जाता है । प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिज्ञ विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था कि जब भी कभी मैं अपने जीवन की चिंताओं के बारे में पीछे लौटकर देखता हूं तो मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की कहानी याद आ जाती है जिसने अपनी मृत्यु शैया पर कहा था कि वह ताउम्र बेशुमार चिंताओं और भय से परेशान रहा , लेकिन उनमें से अधिकांश चिंताएं कभी _ _ भी घटित नहीं हुईं । आशय यह है कि हम चिंताओं से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं , लेकिन उनके बोझ तले खुद के जीवन को अव्यवस्थित होने से तो बचा ही सकते हैं । यदि आप यह सोचते हैं कि आपके चिंता करने से जीवन में गुजरे कल और आने वाले कल की घटनाएं बदल जाएंगी तो आप पृथ्वी से इतर किसी अन्य ग्रह पर फंतासी की दुनिया में रह रहे होते हैं । पतझड़ में किसी पेड़ से टूटे पत्ते को गौर से देखिए । इन पत्तों का अपना कोई वजूद नहीं होता है । तेज हवाएं इन्हें अपनी दिशा में उड़ा ले जाती हैं । मानव जीवन भी अंततः इन टूटे पत्तों सरीखे ही होता है । जिसे वक्त और प्रारब्ध की तेज आंधी बहा ले जाती है । हम यहीं बेबस हो जाते हैं , यही मानव की हार है । फिर चिंताओं को खुद के जीवन को बहा ले जाने क्यों दें ? खुद पर भरोसा रखते हुए जीवन को बेपरवाह क्यों न जिएं ?
life and worry . जीवन और चिंता मानव जीवन का गंभीरता से अध्ययन करें तो यह सत्य सहजता से मुखर होता है कि इस दुनिया में मानव का चिंताओं से रिश्ता धरती पर सभ्यता के विकास सरीखा ही प्राचीन और सनातन है । चिंताएं खुले आकाश की तरह अनंत और गहरे सागर की तरह अगाध होती हैं । इनकी अपनी प्रकृति और प्रभाव होते हैं । कुछ चिंताओं से जीवन की दिशा अवरुद्ध हो जाती है तो कुछ चिंताएं आश्चर्यजनक रूप से उत्प्रेरक का कार्य करती हैं । चिंताएं जीवन के साथ चलती हैं और ये जीवन के साथ ही खत्म होती हैं । यही कारण है कि चिंतारहित जीवन की संभावना महज कल्पना है , किंतु चिंताओं पर चिंतन यहीं खत्म नहीं हो जाता है । प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिज्ञ विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था कि जब भी कभी मैं अपने जीवन की चिंताओं के बारे में पीछे लौटकर देखता हूं तो मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की कहानी याद आ जाती है जिसने अपनी मृत्यु शैया पर कहा था कि वह ताउम्र बेशुमार चिंताओं और भय से परेशान रहा , लेकिन उनमें से अधिकांश चिंताएं कभी _ _ भी घटित नहीं हुईं । आशय यह है कि हम चिंताओं से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं , लेकिन उनके बोझ तले खुद के जीवन को अव्यवस्थित होने से तो बचा ही सकते हैं । यदि आप यह सोचते हैं कि आपके चिंता करने से जीवन में गुजरे कल और आने वाले कल की घटनाएं बदल जाएंगी तो आप पृथ्वी से इतर किसी अन्य ग्रह पर फंतासी की दुनिया में रह रहे होते हैं । पतझड़ में किसी पेड़ से टूटे पत्ते को गौर से देखिए । इन पत्तों का अपना कोई वजूद नहीं होता है । तेज हवाएं इन्हें अपनी दिशा में उड़ा ले जाती हैं । मानव जीवन भी अंततः इन टूटे पत्तों सरीखे ही होता है । जिसे वक्त और प्रारब्ध की तेज आंधी बहा ले जाती है । हम यहीं बेबस हो जाते हैं , यही मानव की हार है । फिर चिंताओं को खुद के जीवन को बहा ले जाने क्यों दें ? खुद पर भरोसा रखते हुए जीवन को बेपरवाह क्यों न जिएं ?
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