Prem or mohe maya प्रेम और मोह माया

                  Love and fascination .                                                                                                                                   
.              What is difference between prem or mohe                                                                                     प्रेम और मोह - माया _ _ समग्र संसार मोह और माया में डूबा हुआ है । जीवन में मोह और माया की तृष्णा निरंतर बढ़ रही है । अधीरता शांति के मार्ग में बाधक बन रही है । व्यग्रता मनुष्य को तनावशील बना रही है । मोह और माया जीवन के क्षणिक आनंद हैं , जबकि प्रेम शाश्वत उपक्रम है , कभी नहीं घटने वाला अमृत कलश है । मोह और माया स्वार्थ की भावनाओं में लिप्त हैं । प्रेम परोपकारी गुण लिए हुए है । मोह और माया से ग्रस्त मानव का पागलपन दूसरों के लिए सदैव कष्टकारी साबित होता है । प्रेम प्रेरणा का स्वर है । आत्मीयता का अनुपम अहसास है । प्रेम मनुष्य को सदैव ऊर्जावान रखता है , जबकि मोह और माया कुछ समय बाद मनुष्य के जीवन को नीरस कर देती हैं । ये जीवन को कर्तव्यपथ से भटका देती हैं । इसके आवेश में मानव अपने सदगुणों को भूलकर दुर्गणों यथा दंभ और मद्यपान का शिकार हो जाता है । प्रेम में समर्पण और त्याग का भाव होता है , जबकि मोह और माया में केवल हासिल करने की चाह होती है । स्वयं के लाभ के आगे सब कुछ गौण होने लगता है । प्रेम का पथ बेहद कठिन है । खुद को फना करने का हुनर ही उस पथ को पार कराकर प्रेम की मंजिल से मिला सकता है । प्रेम पवित्रता और सादगी के साथ ही प्राप्त हो सकता है । जब मन और आत्मा का एकाकार प्रेमी से होने लगे तभी प्रेम सच्चे मायनों में अपनी परिणति तक पहुंचता है । देह पर टिका प्रेम केवल वासनाओं का मोह है । मोह भंग हो सकता है , लेकिन प्रेम कभी भंग नहीं होता । प्रेम अखंडित , अक्षय और अलौकिक अभिव्यक्ति है । प्रेम ही मानव को मानव बना सकता है । प्रेम की मधुरता ही जग में मैत्री भाव को बढ़ा सकती है । मोह और माया दूरियां बढ़ाती हैं , लेकिन प्रेम दूरियों को सिमटकर हमें अपनों के सन्निकट ले आता है । अतः प्रेम करें , मोह और माया से दूर रहें ।

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