Prem ka arth प्रेम का अर्थ

                                         Love.                                                                                                                                                 
 .                                                                                                                                                                                     प्रेम....... किसी मूक बधिर से गुड़ के स्वाद के बारे में पर उत्तर में संवाद का नितांत अभाव होता है । उसके चेहरे की भाव - भंगिमा और आंखों के भाव में गुड़ के मिठास की अभिव्यक्ति होती है । सच पूछिए तो प्यार का इजहार भी उस मूक बधिर की मौन अभिव्यक्ति से जरा भी इतर नहीं है । किंतु आज के मानव ने प्यार के सात्विक एवं मौलिक भाव को विकत कर दिया है । ऐसे में यह प्रश्न खडा होता है कि आखिर प्यार का सच्चा स्वरूप क्या है ? प्यार और आसक्ति के मध्य की लक्ष्मण रेखा की डोर समय के साथ दरक क्यों जाती है ? मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र के शबरी के जूठे बेर के प्रति समर्पण में अंतर्निहित प्रेम को क्या नाम देंगे ? मुरली मनोहर कृष्ण के प्रति मीरा की भक्ति में प्रेम का कौन - सा स्वरूप जीवंत हो उठता है ? सूरदास और तुलसीदास के अपने आराध्यों के प्रति भक्ति भाव के समर्पण में प्रेम का कौन - सा भाव पलता है ? जब ईसा मसीह को उनकी आंखों के सामने उनके ईश्वर की छवि लुप्त हो जाती थी तो वे हताशा में चिल्ला उठते थे , ' मेरे भगवान तुम कहां हो ? ' अपने आराध्य के प्रति ईसा के इस प्रेम के मद्देनजर आज के समाज को प्यार के अद्भुत और अलौकिक भाव को गहराई से पढ़ने की आवश्यकता है । - प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक हेलेन केलर ने एक बार कहा था , ' इस दुनिया की सर्वोत्तम और सबसे खूबसूरत क्षण को न तो देखा जा सकता है और न ही सुना जा सकता है । उसे केवल दिल से महसूस किया जा सकता है । ' दुर्भाग्यवश इसके विपरीत प्यार को केवल देखने , सुनने और स्पर्श करने की चाहत में छपे अंदेशों को हम कभी पढ ही नहीं पाते हैं । प्लेटो ने कहा था कि प्यार के स्पर्श के साथ हर कोई कवि बन जाता है । अपने दिलों में प्यार के अहसास को महसूस करना ही कवि बनना होता है और जिस दिन हमने ऐसा कर लिया उसी दिन मानवता के सनातनी भाव की जीत होगी ।

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