Jivatma ka shatru जीवात्मा का शत्रु

                          The enemy of the soul.                                                                                                       
Jivatma ka shatrue
                                                                                                                                     नमस्कार हिंदी पुंज में आपका स्वागत है। आज हम एक नए  विषय पर चर्चा करेंगे । । ।।                                        जीवात्मा का शत्रु। । । ।।                                      जीवात्मा का शत्रु संसार में अक्सर मनुष्य को अपने शत्रु और मित्रों की पहचान नहीं होती है । इसी कारण वह जीवन में शत्रुओं द्वारा परास्त होता है । यही जानने के लिए अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा था कि यदि जीवात्मा ईश्वर का ही अंश है तो वह पाप कर्मों की ओर क्यों उन्मुख होती है । भगवान ने इसके उत्तर में कहा कि जब जीवात्मा भौतिक सृष्टि के संपर्क में आती है तो उसका शाश्वत ईश्वर प्रेम प्रकृति के रजोगुण के कारण कामना में परिवर्तित हो जाता है । इसी कामना की तुष्टि और इंद्रिय तृप्ति के लिए वह पाप कर्म भी करता है । ऐसा न होने पर वह क्रोधित होता जाता है । क्रोध तमोगुण का सूचक है । चूंकि तीनों गुण सतो , रजो एवं तमो विभिन्न मानसिक | प्रवत्तियों और सोच द्वारा अपना प्रभाव जीव पर डालते हैं , इसीलिए मानव को अपनी उन्नति के लिए रजोगुण से सतोगुण की तरफ बढ़ना चाहिए , परंतु वह कामना एवं इंद्रियों की तृप्ति के लिए तमोगुण की तरफ बढ़ता है और इस प्रकार संसार के आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता है । गीता में भगवान ने कहा है कि हमें अपने विवेक का प्रयोग अपने कर्म बंधन से मुक्त होने के लिए करना चाहिए । परंतु वह इंद्रिय तृप्ति के चक्कर में और कर्म बंधन में फंसा रहता है । अर्जुन ने भगवान के मार्गदर्शन में महाभारत रूपी जीवन संग्राम में विजय प्राप्त की , उसी प्रकार मनुष्य को अपने गुरु के संरक्षण में रहकर गीता में सुझाए कर्मयोग के द्वारा नियत कर्म करते हुए करते हुए संसार से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए । गीता के अनुसार अपना नियत कर्म नहीं करना भी पाप है । जैसे कि अर्जुन | का नियत कर्म युद्ध करना था । इसीलिए भगवान ने सभी तर्कों द्वारा सिद्ध किया कि अर्जुन को युद्ध करना चाहिए । अध्यात्म के मार्ग पर चलकर नियत कर्म करते हुए मनुष्य को अपने सबसे बड़े शत्रु काम या कामना को परास्त करना चाहिए । यही महाभारत रूपी जीवन संग्राम को जीतने का उपाय है ।.        

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