Satvik daan ka mahatva सात्विक दान का महत्व

               दान की महिमा                                                           
 Satvik daan ka mahetva.                                                                    नमस्कार हिंदी पुंज में आपका स्वागत है।आज हम सात्विक दान के बारे में चर्चा करेंगे ।।                                       सात्विक दान हमारे आध्यात्मिक ग्रंथों में दान की महिमा सर्वोपरि है । दान की प्रवृत्ति हमारी उन्नत एवं समृद्ध आध्यात्मिक संस्कृति का प्राण तत्व है । गीता के 17वें अध्याय में भगवान कृष्ण ने कहा है कि सात्विक दान ही उत्तम दान है । प्रायः देखा जाता है कि जिसे हम कुछ दान देते हैं , उससे बदले में कुछ आशा अवश्य रखते हैं , यही प्रवृत्ति दान के वास्तविक सौंदर्य को नष्ट कर देती है । अपात्र , अयोग्य व्यक्ति को दिया गया दान दाता को अधोगति की ओर ले जाता है । सात्विक दान की प्रवृत्ति दाता तथा जिसको दिया गया है , दोनों का कल्याण करती है । जो मनुष्य अपनी भौतिक संपत्ति का न तो स्वयं उपभोग करता है , न ही शुभ कर्मों में दान देता है उसके धन की तीसरी गति नाश निश्चित है । सात्विक दान से मानसिक पटल में व्याप्त अहंकार , लोभ , स्वार्थमयी प्रवृत्ति का | नाश होता है । मनुष्य के अंतःकरण में सात्विक दान आनंद एवं विनम्रता का संचार करता है । भौतिक पदार्थों के प्रति मोह की जो ग्रंथि हमारे पारलौकिक जीवन में बाधक है , सात्विक दान उसको भी क्षीण करके आनंद एवं शांति की प्राप्ति करवाता है । सात्विक दान के रूप में हम जो भी सामग्री निःस्वार्थ भाव से किसी को समर्पित करते हैं वह निरंतर वृद्धि को प्राप्त होती है । सात्विक दान हमारे धन को पवित्र कर देता है । दान की यही भावना मनुष्य की बैर भावना को समाप्त कर देती है । भाग्य प्रतिकूल हो या अनुकूल मनुष्य को सदैव दान देना चाहिए । सात्विक भावना से दिया गया दान मोक्ष के द्वार खोलने वाला कहा गया है । सात्विक दान ही मनुष्य को मानसिक एवं आत्मिक आनंद की अनुभूति करवाता है । यही हमारी स्वर्णिम संस्कृति का मर्म है । इसी श्रेष्ठ सात्विक दान को वेदव्यास जी ने इस लोक में तथा मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य का मित्र बताया है । सात्विक दान की भावना जिस व्यक्ति के हृदय में है वह इस धरा का सौभाग्यशाली मनुष्य है । .                                                                                      दान का महत्व इस समय पूरी दुनिया कोरोना संकट से जूझ रही है । इसने गरीबों के लिए जीवन और दुरूह बना दिया है । ऐसे में जो संपन्न हैं , उन्हें खुले हाथों से दान करने के लिए आगे आना चाहिए । दान की महिमा - प्रत्येक धर्म और उसके ग्रंथों में भी उल्लिखित है । वैसे भी लोग मंदिर , मस्जिद , गुरद्वारों और गिरजाघरों में लाखों - करोड़ों रुपये दान करते आए हैं । ऐसे में उन लोगो को महामारी से लड़ने के लिए जरूरतमंदों की मदद के लिए भी दान देना चाहिए । दान और परोपकार की सीख हम प्रकृति से ले सकते है । सूर्य , चंद्रमा , वायु , अग्नि , जल , आकाश , पृथ्वी , पेड़ - पौधे आदि सभी मानव कल्याण में लगे रहते हैं । ईश्वर ने प्रकृति की रचना इस तरह से की है कि आज तक परोपकार उसके मूल में ही काम कर रहा है । दान और परोपकार प्रकृति के कण - कण में समाया हुआ है । जिस तरह वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं , नदियां परोपकार के लिए शीतल जल देती हैं उसी तरह मनुष्य को भी दान करना चाहिए । _ _ _ धन का इस्तेमाल तीन तरीकों से होता हैं जिसमें दान को सर्वोत्तम माना गया हैं । पहला दान धन का दान या त्याग महानता की निशानी होती है । इसलिए अतीत में लोग अधिक से अधिक दान दिया करते थे । दूसरा भोग , धन का उपयोग रोटी , कपड़ा , मकान और अन्य सुख - सुविधाओं के लिए करना भी उत्तम माना जाता हैं । तीसरा नाश , यदि आप धन को दान नहीं देते हैं और उसे अपने ऊपर खर्च भी नहीं करते हैं तो उस धन का आप नाश कर रहे हैं । इसलिए दान , खर्च और बचत में एक संतलन जरूर होना चाहिए । बाइबल में तीन सद्गुण माने गए है आशा , विश्वास और दान । दान इनमें सबसे बढकर है । कुरान में कहा गया है कि प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है , उपवास हमको उनके महल के दरवाजे तक पहुंचा देता है और दान से हम अंदर प्रवेश करते हैं । अथर्ववेद के एक श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य को सैकड़ों हाथों से कमाना चाहिए और हजार हार्थी वाला होकर समदृष्टि से दान देना चाहिए ।

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